विश्वकर्मा जी को देव शिल्पी क्यों कहा जाता है

Shareपरमेश्वर यादव कुशीनगर हम भगवान विश्वकर्मा के बारे में सुनते रहते हैं लेकिन बहुत ही कम लोग इनके विषय में जानते हैं। हममें से कुछ ही लोग ऐसे होंगे...

परमेश्वर यादव
कुशीनगर हम भगवान विश्वकर्मा के बारे में सुनते रहते हैं लेकिन बहुत ही कम लोग इनके विषय में जानते हैं। हममें से कुछ ही लोग ऐसे होंगे जो कि वास्तव में यह जानते होंगे कि विश्वकर्मा जी को देव शिल्पी क्यों कहा जाता है। स्कंद पुराण के अंतर्गत विश्वकर्मा जी का परिचय “बृहस्पते भगिनी भुवना ब्रह्मवादिनी। प्रभासस्य तस्य भार्या बसूनामष्टमस्य च। विश्वकर्मा सुतस्तस्यशिल्पकर्ता प्रजापति” श्लोक के जरिए मिलता है। जिसका अर्थ है महर्षि अंगिरा के ज्येष्ठ पुत्र बृहस्पति की बहन भुवना ब्रह्मविद्या की जानकार थीं। उनका विवाह आठवें वसु महर्षि प्रभास के साथ हुआ था। विश्वकर्मा जी इन्हीं के संतान थे। कही कही इनको ब्रह्मा जी का पुत्र भी कहा गया है, जिन्हें देवताओं का शिल्पी के रूप में जाना जाता है। इसके अलावा इनको को सभी शिल्पकारों और रचनाकारों का इष्ट देव भी कहा गया है,तथा इनको ब्रह्मांड का रचयिता भी माना जाता है, ऋग्वेद के अंतर्गत इनको सत्य के तौर पर सर्वश्रेष्ठ माना गया है। इन्होंने विभिन्न स्थानों का निर्माण किया है।, जिनके आधार पर उन्हें देव शिल्पी की उपाधि प्राप्त हुई ।

विश्वकर्मा जी का निर्माण कुछ इस प्रकार से है

★ वाल्मीकि रामायण के अनुसार रावण की सोने की खूबसूरत लंका का निर्माण भगवान विश्वकर्मा ने ही किया था पौराणिक दस्तावेजों के अनुसार माल्यवान और माली एवं सुमाली नामक तीन राक्षस इनके पास गए और उनसे अपने लिए भव्य महल और राज्य का निर्माण करने के लिए कहा। उन्होंने बताया कि इन्द्र की आज्ञा पाकर त्रिकुट पर्वत पर बसी सोने की लंका का निर्माण किया है, तुम वहां जाकर रह सकते हो। इस तरह लंका पर राक्षसों का आधिपत्य स्थापित हो गया । जबकि कुछ स्थानों पर यह पढ़ने को मिलता है कि रावण के सौतेले भाई धन कुबेर के कहने पर ही विश्वकर्मा ने सोने की लंका का निर्माण किया था। इस लंका को बाद में धन कुबेर ने ही रावण को दे दिया था।
★ त्रेता युग में जब रावण ने सीता जी का हरण कर अपने पुष्पक विमान से लेकर उन्हें लंका ले गया था ,तब वहां तक पहुंचने के लिए भगवान राम की आज्ञा पाकर वानर सेना ने सागर पर पुल बांधा था।वाल्मीकि रामायण के अनुसार शिल्पकला में निपुण नल नामक वानर जो विश्वकर्मा का ही अंश पुत्र था, जिन्होंने रामसेतु का निर्माण किया था।
★ जिस रथ पर बैठकर महादेव ने विद्युन्माली, तारकाक्ष और कमलाक्ष का वध किया था, उस रथ का निर्माण करने वाले भगवान विश्वकर्मा ही थे। महादेव का यह रथ सोने का था जिसके दाहिने चक्र में सूर्य और बाएं चक्र में चंद्रमा विराजमान थे। इसके अलावा दाहिने पहिए में 12 और बाएं पहिए में 16 आरे लगे थे।
★ द्वापर युग में भगवान
श्रीकृष्ण की द्वारका नगरी का निर्माण करने वाले भी विश्वकर्मा जी ही थे। इस नगरी के आधार पर भगवान विश्वकर्मा ने अपनी वैज्ञानिकता का एक अद्भुत मिसाल पेश किया था । जिसकी लंबाई और चौड़ाई, दोनों ही 48 कोस का है। वास्तुशास्त्र के अनुसार इस नगरी में भवन, सड़के, नालियां , गलियों और चौराहों का निर्माण किया गया था। जो आज वर्तमान में गुजरात में द्वारकापूरी के नाम से प्रसिद्ध है।
★द्वापर युग में भगवान कृष्ण के कहने पर पांडवों के लिए विश्वकर्मा जी ने इंद्रप्रस्थ का निर्माण किया था, जो बहुत ही अदभुत और सुंदर था।
उक्त निर्माण के कारण इनको देव शिल्पी का उपाधि मिला। जिसके कारण इनको देव शिल्पी कहा जाता है ।

देवताओं के शिल्पकार को विश्वकर्मा दिवस के रूप में मनाये जाने की परंपरा है। जो सितंबर माह के 17 तारीख को बड़ी धूम-धाम से विश्वकर्मा दिवस के रूप में मनाया जाता है और इस दिन सभी छोटे बढ़े कारीगर, मोटर वाहन, कल कारखाने अपने-अपने औजारों और मशीनों की पूजा करते हैं।

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