राम नाम की महिमा को, भक्तगण कर रहे हैं रसपान

Shareयदुवंशी टाइम्स न्यूज़ नेटवर्क कुशीनगर पडरौना नगर से लगभग 7 किलोमीटर दूरी पर स्थित सोमेश्वर धाम सिमरिया में सामान्य जन समस्या निवारण मिशन के उपाध्यक्ष पंडित अशोक तिवारी द्वारा आयोजित...

यदुवंशी टाइम्स न्यूज़ नेटवर्क

कुशीनगर पडरौना नगर से लगभग 7 किलोमीटर दूरी पर स्थित सोमेश्वर धाम सिमरिया में सामान्य जन समस्या निवारण मिशन के उपाध्यक्ष पंडित अशोक तिवारी द्वारा आयोजित किए गए शतचंडी पाठ, एवं रामायण का पाठ वृंदावन से आए महान कथावाचक श्री अमरनाथ पांडे जी द्वारा रसपान कराया जा रहा है। राम नाम की महिमा को बड़े ही तार्किक और सरल ढंग से समझाया गया है। जिसको भक्तगण राम महिमा को आसानी से समझ जा रहे हैं तथा कथा सुनने के लिए उत्साहित हो रहे हैं।

“राम नाम अवलंब बिनु, परमारथ की आस।
बरषत वारिद-बूँद गहि, चाहत चढ़न अकास॥”

राम-नाम का आश्रय लिए बिना जो लोग मोक्ष की आशा करते हैं अथवा धर्म,अर्थ, काम और मोक्ष रूपी चारों परमार्थों को प्राप्त करना चाहते हैं वे मानो बरसते हुए बादलों की बूँदों को पकड़ कर आकाश में चढ़ जाना चाहते हैं। यानी कि जिस प्रकार पानी की बूँदों को पकड़ कर कोई भी आकाश में नहीं चढ़ सकता वैसे ही राम नाम के बिना कोई भी परमार्थ को प्राप्त नहीं कर सकता। उन्होंने दोहा के माध्यम से बताया और भक्त गण को समझया।

“हरे चरहिं तापहिं बरे, फरें पसारहिं हाथ।
तुलसी स्वारथ मीत सब, परमारथ रघुनाथ॥”

वृक्ष जब हरे होते हैं, तब पशु-पक्षी उन्हें चरने लगते हैं, सूख जाने पर लोग उन्हें जलाकर तापते हैं और फलने पर फल पाने के लिए लोग हाथ पसारने लगते हैं (अर्थात् जहाँ हरा-भरा घर देखते हैं, वहाँ लोग खाने के लिए दौड़े जाते हैं, जहाँ बिगड़ी हालत होती है, वहाँ उसे और भी जलाकर सुखी होते हैं और जहाँ संपत्ति से फला-फूला देखते हैं, वहाँ हाथ पसार कर मांगने लगते हैं)। तुलसी कहते है कि इस प्रकार जगत में तो सब स्वार्थ के ही मित्र हैं। परमार्थ के मित्र तो एकमात्र हमारे श्री रघुनाथ जी ही हैं।

“राम नाम रति राम गति, राम नाम बिस्वास।
सुमिरत सुभ मंगल कुसल, दुहुँ दिसि तुलसीदास॥”

 

जिसका राम नाम में प्रेम है, राम ही जिसकी एकमात्र गति है और राम नाम में ही जिसका विश्वास है, उसके लिए राम नाम का स्मरण करने से ही दोनों ओर (इस लोक में और परलोक में) शुभ, मंगल और कुशल है।

“जग ते रहु छत्तीस ह्वै, रामचरन छ: तीन।
तुलसी’ देखु विचारि हिय, है यह मतौ प्रबीन॥”

संसार में तो छत्तीस के अंक के समान पीठ करके रहो, और राम के चरणों में त्रेसठ के समान सम्मुख रहो। चतुर पुरुषों के इस मत को अपने हृदय में विचार करके देख लो। भाव यह है कि 36 के अंक में 3 और 6 इन दोनों अंकों की आपस में पीठ लगी रहती है पर 63 में 6 और 3 इन दोनों के मुख आमने-सामने होते हैं। इसलिए मनुष्यों को चाहिए कि वे संसार से तो सदा 36 के अंक के समान पीठ फेर कर विरक्त रहें परंतु भगवान् राम के चरणों के प्रति 63 के अंक के समान सदा अनुकूल रहें। भाव यह है कि 36 के अंक में 3 और 6 इन दोनों अंकों की आपस में पीठ लगी रहती है पर 63 में 6 और 3 इन दोनों के मुख आमने-सामने होते हैं। इसलिए मनुष्यों को चाहिए कि भगवान् राम के चरणों के प्रति 63 के अंक के समान सदा अनुकूल रहें।

कार्यक्रम के दौरान अनिल कुमार पाण्डेय, संजय चौबे, राजेश पांडेय, बृहस्पति मिश्रा, मयंक पाण्डेय, योगेन्द्र पाण्डेय आदि सदस्य और भक्तगण तथा ग्रामवासी उपस्थित रहे।

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