बांस बायोचार से मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार

Share▪अंतरराष्ट्रीय डिजिटल पब्लिकेशन संस्था ASCE अमेरिका ने शोध-पत्र चयनित कर प्रकाशित किया है जो भारत के लिए गौरव का क्षण है। यदुवंशी टाइम्स न्यूज नेटवर्क कुशीनगर जनपद के रामकोला...

▪अंतरराष्ट्रीय डिजिटल पब्लिकेशन संस्था ASCE अमेरिका ने शोध-पत्र चयनित कर प्रकाशित किया है जो भारत के लिए गौरव का क्षण है।

यदुवंशी टाइम्स न्यूज नेटवर्क
कुशीनगर जनपद के रामकोला बिकास खण्ड के गांव सिधावें पठान पट्टी निवासी भगवन्त यादव के सुपुत्र शैलेष कुमार यादव आईआईटी पटना भूविज्ञान एवं पर्यावरण संरक्षण पर शोध कर रहे हैं जिनका शोध कार्य अंतिम चरण में है बताते चलें कि इनका अमेरिकन सोसायटी सिविल इंजीनियरिंग की अंतर्राष्ट्रीय पब्लिकेशन डिजिटल संस्था ASCE ने इनका शोध चयनित कर प्रकाशित किया है जिसमें भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) पटना के शोधकर्ताओं ने बांस बायोचार के उपयोग से मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार करने के लिए एक नया अध्ययन किया है।जो विश्व स्तरीय अमेरिका की अंतर्राष्ट्रीय संस्था ASCE ने चयनित किया है और इस अध्ययन में पाया गया है कि बांस बायोचार मिट्टी की जल-धारण क्षमता को बढ़ा सकता है, जिससे यह लैंडफिल कवर में प्राकृतिक मिट्टी को संशोधित करने के लिए उपयुक्त हो सकता है।

शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में पाया कि बांस बायोचार मिट्टी की संपीड़नशीलता और हाइड्रोलिक कंडक्टिविटी को भी प्रभावित कर सकता है। यह अध्ययन जर्नल ऑफ मैटेरियल्स इन सिविल इंजीनियरिंग में प्रकाशित हुआ है।

आईआईटी पटना के शोधकर्ता शैलेश कुमार यादव और रामकृष्ण बाग ने इस अध्ययन को अंजाम दिया है। उन्हें उम्मीद है कि उनके इस अध्ययन से मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार करने और लैंडफिल कवर के डिजाइन में सुधार करने में मदद मिलेगी।
इसकी जानकारी दूरभाष पर परिवार जनों को शैलेष कुमार यादव ने दी जिससे माता पिता परिवार और गांव में खुशी की लहर है
बांस बायोचार के उपयोग से मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार करने का शोध विभिन्न देशों में सफल हो सकता है, खासकर उन देशों में जहां:

1. उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय जलवायु: बांस की खेती आम है और बायोचार के उत्पादन के लिए उपयुक्त है।
2. मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार की आवश्यकता: जहां मिट्टी की गुणवत्ता खराब है और जल-धारण क्षमता कम है।
3. लैंडफिल कवर और अपशिष्ट प्रबंधन: जहां लैंडफिल कवर और अपशिष्ट प्रबंधन एक बड़ी चुनौती है।

ऐसे देशों में शामिल हो सकते हैं:

1. भारत: बांस की विविधता और व्यापक खेती के कारण।
2. चीन: बांस की खेती और बायोचार के उपयोग में अग्रणी।
3. दक्षिण पूर्व एशिया: इंडोनेशिया, मलेशिया, थाईलैंड जैसे देशों में बांस की खेती आम है।
4. अफ्रीका: कुछ अफ्रीकी देशों में बांस की खेती और बायोचार के उपयोग की संभावना है।
5. लैटिन अमेरिका: ब्राजील, मेक्सिको जैसे देशों में बांस की खेती और बायोचार के उपयोग की संभावना है।

यह शोध उन देशों में अधिक प्रभावी हो सकता है जहां बांस की खेती और बायोचार के उपयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है।

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