राधाष्टमी के अवसर पर श्रीचित्रगुप्त धाम मे शुरु हुआ भागवत कथा

Shareकुशीनगर। नगर के श्रीचित्रगुप्त धाम स्थित श्री चित्रगुप्त मंदिर में बुधवार को राधाष्टमी के अवसर पर भागवत कथा की रसधार बहने लगी। सात दिवसीय इस कथा यात्रा के पहले...

कुशीनगर। नगर के श्रीचित्रगुप्त धाम स्थित श्री चित्रगुप्त मंदिर में बुधवार को राधाष्टमी के अवसर पर भागवत कथा की रसधार बहने लगी। सात दिवसीय इस कथा यात्रा के पहले दिन श्री चित्रगुप्त मंदिर पडरौना व अयोध्या के विश्वकर्मा मंदिर के पीठाधीश्वर श्री अजय दासजी महराज ने कथा के महत्व और श्रवण पर प्रकाश डाला। उन्होने ने कहा कि कथा श्रवण जन्म-जन्मांतर के पुण्य का फल है।
बड़े सौभाग्य से मनुष्य का तन मिला है और बड़े ही सौभाग्यशाली होते है वह लोग जिन्हे कथा सुनने का अवसर प्राप्त होता है। जैसे गंगाजल पुराना नहीं होता, वैसे ही कथा भी कभी पुरानी नहीं होती। श्रीदासजी महाराज ने भगवत कथा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि कथा श्रवण से तीन प्रकार के पापों का निवारण होता है और धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति होती है। जैसे सभी नदियों में ” गंगा नदी “श्रेष्ठ है, उसी तरह 18 पुराणों में श्रीमद् भागवद श्रेष्ठ है। कथा का पहले दिन श्री दासजी महराज ने कुन्ती स्तुति को विस्तारपूर्वक समझाते हुए राजा परिक्षित के जन्म एवं शुकदेव महाराज के आगमन की कथा सुनाई। उन्होने कहा कि भगवान की लीला अपरंपार है, वे अपनी लीलाओ के माध्यम से मनुष्य और देवताओ के धर्मानुसार आचरण करने के लिए प्रेरित करते है। बीच-बीच मे कथावाचक महाराज भजनों द्वारा माहौल को रमणीमय बना रहे थे।
पीठाधीश्वर महाराज ने कहा कि भागवत कथा मे जीवन का सार तत्व मौजुद है, जरूरी है निर्मल मन और स्थित चित्त के साथ कथा श्रवण करने की। भागवत श्रवण से प्रेतयोनी से मुक्ति मिलती है और मनुष्य को परमानन्द की प्राप्ति होती है ।चित्त स्थिरता के साथ ही श्रीमदभागवत कथा हर व्यक्ति को सुनना चाहिये इसके श्रवण मात्र से मनुष्य के सम्पूर्ण कलेश दूर हो जाती है।
हर वर्ष के भाति इस वर्ष भी  राधाष्टमी के अवसर पर श्रीमदभागवत कथा के प्रथम दिवस पर भगवान के विराट रूप का वर्णन किया गया। इसका रसपान कर भक्त भाव- विभोर हो हो गए। भजन,गीत, संगीत पर भक्त दरी रात तक झूमते रहे।
प्रवचन के पूर्व वेद मंत्र से भागवत ग्रंथ का पूजन किया गया। मुख्य यजमान बिहार प्रदेश के पुलिस अधिकारी लक्ष्मी नरायण व जगतानन्द श्रीवास्तव को पुप्पहार पहना कर मंत्रोच्चार के साथ श्रीदासजी ने पूजा-अर्चना कराया । इस दौरान सैकड़ों भक्त मौजूद थे और “राधे- राधे” की जयघोष से पुरा वातावरण भक्तिमय बना रहा।

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