महिलाओं ने रखा जीवित्पुत्रिका व्रत , सूनी और सुनाई कथा

Shareपरमेश्वर यादव कुशीनगर आश्विन मास (कुआर) कृष्ण पक्ष अष्टमी के दिन महिलाएं जीवित्‍पुत्रिका व्रत (जिउतिया व्रत) पुत्र की लंबी आयु के लिए विधि विधान से पूजा कर निर्जला व्रत रहती...

परमेश्वर यादव

कुशीनगर आश्विन मास (कुआर) कृष्ण पक्ष अष्टमी के दिन महिलाएं जीवित्‍पुत्रिका व्रत (जिउतिया व्रत) पुत्र की लंबी आयु के लिए विधि विधान से पूजा कर निर्जला व्रत रहती हैं।
बताते चले कि आश्विन मास (कुआर) के सतमी के भोर में नहा कर पूजा अर्चना करने के बाद जलपान करती है उसके बाद महिलाएं अपने पुत्र के लंबी आयु लिए चौबीस घंटे का निर्जला व्रत रहती है।उसी दौरान महिलाएं आपस बैठकर एक दूसरे से जीवित्पुत्रिका व्रत की कहानी कहते और सुनते हैं।आश्विन मास (कुआर) के नवमी के दिन एक से दो घंटे तक खरना करने बाद अपना व्रत तोड़ते है।
महाभारत काल के अनुसार
महाभारत के युद्ध में अपने पिता की मौत के बाद अश्वत्थामा बहुत नाराज था। उसके हृदय में बदले की भावना भड़क रही थी। इसी के चलते वह पांडवों के शिविर में घुस गया। शिविर के अंदर पांच लोग सो रहे थे। अश्वत्थामा ने उन्हें पांडव समझकर मार डाला। वे सभी द्रोपदी की पांच संतानें थीं। फिर अर्जुन ने उसे बंदी बनाकर उसकी दिव्य मणि छीन ली। अश्वत्थामा ने बदला लेने के लिए अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ में पल रहे बच्चे को गर्भ को नष्ट कर दिया। ऐसे में भगवान श्रीकृष्ण ने अपने सभी पुण्यों का फल उत्तरा की अजन्मी संतान को देकर उसको गर्भ में फिर से जीवित कर दिया। गर्भ में मरकर जीवित होने के कारण उस बच्चे का नाम जीवित्पुत्रिका पड़ा। तब से ही संतान की लंबी उम्र और मंगल के लिए जितिया का व्रत किया जाने लगा।
व्रत की पौराणिक कथा
गन्धर्वराज जीमूतवाहन बड़े धर्मात्मा और त्यागी एव परोपकारी पुरुष थे। इन्हें युवाकाल में ही राजपाट मिल गया था। लेकिन राजपाट में इनका मन नही लगता था । उन्होंने राजपाट छोड़कर वन में पिता की सेवा करने चले गए थे। वन में ही इनकी शादी मलयवती नामक एक राजकुमारी से हो गई। एक दिन भ्रमण कर रहे थे उसी दौरान उन्हें वन में विलाप करते हुए नागमाता मिली। जब जीमूतवाहन ने उनके विलाप करने का कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि नागवंश गरुड़ से काफी परेशान है, वंश की रक्षा करने के लिए नागवंश ने गरुड़ से समझौता किया है कि वे प्रतिदिन उसे एक नाग खाने के लिए देंगे और इसके बदले वो हमारा सामूहिक शिकार नहीं करेगा। इस प्रक्रिया में आज उसके पुत्र को गरुड़ के सामने जाना है। नागमाता की पूरी बात सुनकर जीमूतवाहन ने उन्हें वचन दिया कि वे उनके पुत्र को कुछ नहीं होने देंगे और उसकी जगह कपड़े में लिपटकर खुद गरुड़ के सामने उस शिला पर लेट जाएंगे, जहां से गरुड़ अपना आहार उठाता है और उन्होंने ऐसा ही किया। गरुड़ ने जीमूतवाहन को अपने पंजों में दबाकर पहाड़ की तरफ उड़ चला। जब गरुड़ ने देखा कि हमेशा की तरह नाग चिल्लाने और रोने की जगह शांत है, तो उसने कपड़ा हटाकर जीमूतवाहन को पाया। जीमूतवाहन ने नाग माता सारी कहानी गरुड़ को बता दी, जिसके कारण जीमूतवाहन को जीवनदान दे दिया और भविष्य में नागों को ना खाने का भी वचन दिया।

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